भीमेश्वरी माता मंदिर (हरयाणा) में आदरणीय नितिन भाऊ सेवाकार्य तथा मानव कल्याण हेतु संकल्प करते हुए एवं सेवेकरि श्री दुर्गा सप्तशती पाठ सेवा में चैतन्य का अनुभव लेते हुए (कुछ दृश्य)

मंदिर के बारे में-
बेरी स्थित मां भीमेश्वरी देवी मंदिर के मुख्य पुजारी बताते हैं कि बेरी कस्बा महाभारत कालीन है। कहते हैं कि कौरव व पांडवों की कुलदेवी हिंगलाज पर्वत, जो अब पाकिस्तान में है, पर निवास करती थीं। महाभारत युद्ध को देखते हुए कुंती ने भीम को पहले कुलदेवी का आशीर्वाद लेने के लिए कहा। भीम हिंगलाज पर्वत पहुंचे और मां की अराधना आरंभ की। माता ने प्रसन्न होकर दर्शन दिए व अराधना का कारण पूछा तो भीम ने महाभारत युद्ध के बारे में बताते हुए साथ चलने की प्रार्थना की। मां इस शर्त पर चलने को तैयार हुई कि रास्ते में कंधे से नीचे नहीं उतारेंगे। मां की प्रतिमा मान भीम अपने कंधे पर विराजमान कर चल पड़े। बेरी पहुंचने पर जंगल में वृक्ष के समीप बाय नामक तालाब के नजदीक भीम को अनायास लघुशंका की इच्छा हुई और उस दौरान मां की शर्त को भूल बैठे।

उन्होंने मां को वहीं रख दिया। लघुशंका से निवृत होकर तालाब में स्न्नान कर जब मां को अपने कंधे पर विराजमान करना चाहा तो प्रतिमा टस से मस न हुई। मां ने कहा मैंने पहले कहा था कंधे से नीचे जहां उतारोगे, वहीं विराजमान हो जाऊंगी। इसके बाद भीम मां का आशीर्वाद लेकर युद्ध के लिए चले गए। यहीं बना मंदिर भीमेश्वरी देवी मंदिर के नाम से जाना जाता है।

दिन में बाहर और रात को भीतर वाले मंदिर में होती है पूजा
बेरी स्थित मां भीमेश्वरी का मंदिर में मां की मूर्ति एक और मंदिर दो हैं। यहां दिन के समय में बाहर वाले मंदिर में पूजा होती है और रात में भीतर वाले मंदिर में। पंडित पुरुषोत्तम वशिष्ठ बताते हैं कि जब भीम का मां ने अनुरोध ठुकरा दिया। उस दौरान यहां दुर्वासा ऋषि ठहरे हुए थे। उन्हें जब इस घटनाक्रम का पता चला तो वे समय मां के पास पहुंचे और उन्हें अनुरोध किया कि संतों के बनाए हुए आश्रम में आकर सेवा स्वीकार करें। मां ने इसे सहर्ष स्वीकार कर लिया। उसके बाद दिन में वहां पर दुर्वासा ऋषि मां की पूजा अर्चना करने लगे। बताते है कि ऋषि दुर्वासा दोनों समय बेरी में आरती के लिए आते थे। आज भी परंपरा के मुताबिक दिन में बाहर वाले मंदिर में और रात के समय में भीतर वाले मंदिर में मां की पूजा अर्चना की जाती है.